खाकी की मिलीभगत या मजबूरी? बस्ती में न्याय के नाम पर विवेचना का मखौल!
जांच अधिकारी पर बिकने का आरोप: दबंगों ने पीटा और पुलिस ने पीड़ित पर ही थोप दी रिपोर्ट?
अजीत मिश्रा (खोजी)
खाकी पर दाग: बस्ती में न्याय की उम्मीद पर जांच अधिकारी ने फेरा पानी?
ब्यूरो रिपोर्ट: बस्ती मंडल (उत्तर प्रदेश)
- कप्तानगंज के रतास गांव में दबंगई का बोलबाला; क्या पुलिस और अपराधियों के बीच साठगांठ से हारेगा पीड़ित?
- बस्ती पुलिस का ‘अजब’ खेल: छुट्टी से लौटते ही बिना जांच के बंद कर दी फाइल!
- कैसी है ये जीरो टॉलरेंस? रतास गांव में दबंगई के आगे नतमस्तक हुए विवेचना अधिकारी।
- न्याय का गला घोंटते ‘कानून के रखवाले’: कप्तानगंज में महिला की चीख अनसुनी, फाइलों में दफन हुआ सच।
- साक्ष्य (Video) होने के बावजूद अंधा बना प्रशासन; क्या अपराधियों को मिल रहा है सरकारी संरक्षण?
बस्ती। जनपद के कप्तानगंज थाना अंतर्गत रतास गांव की एक महिला, शशिप्रभा, आज न्याय के लिए पुलिस अधीक्षक (SP) के दरवाजे पर खड़ी है। मामला केवल रास्ते के विवाद का नहीं, बल्कि पुलिस की उस कार्यशैली का है जो अपराधियों को संरक्षण और पीड़ित को प्रताड़ना देने का काम कर रही है। महिला का आरोप है कि जांच अधिकारी (IO) ने बिना किसी निष्पक्ष विवेचना के आनन-फानन में रिपोर्ट लगा दी, जिससे पुलिस प्रशासन की निष्ठा पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।
दबंगई की हद: घर में घुसकर पीटा, बाल उखाड़े
पीड़िता शशिप्रभा के अनुसार, गांव के ही रामबुझारत और उनके परिवार ने सार्वजनिक रास्ते पर अवैध कब्जा कर लिया है। जब इसका विरोध किया गया, तो बीते 28 अप्रैल को रामबुझारत, उनकी पत्नी अकालपती और बेटी आशा देवी ने मिलकर योजनाबद्ध तरीके से महिला के घर में घुसकर उस पर जानलेवा हमला किया। पीड़िता का आरोप है कि उसे बेरहमी से पीटा गया और उसके बाल तक उखाड़ दिए गए। इस पूरी घटना का वीडियो साक्ष्य होने के बावजूद पुलिस की सुस्ती समझ से परे है।
फर्जी मुकदमे का खेल और पुलिस की ‘मेहरबानी’
हैरानी की बात यह है कि जब पीड़िता ने 112 की मदद से FIR (संख्या 0109) दर्ज कराई, तो उसके जवाब में विपक्षी दल ने दबाव बनाने के लिए 9 मई को महिला और उसके परिवार पर एक फर्जी काउंटर केस दर्ज करा दिया। न्याय का गला तब घोंटा गया जब विवेचना अधिकारी वीरेंद्र कुमार सरोज ने मामले में दिलचस्पी लेना बंद कर दिया।
छुट्टी से लौटे और बिना जांच के फाइल बंद!
शिकायती पत्र में लगाए गए आरोप चौंकाने वाले हैं। बताया गया कि जांच अधिकारी 30 अप्रैल को बयान लेने के बाद 5 दिन की छुट्टी (C.L.) पर चले गए। 9 मई को वापस आते ही उन्होंने बिना किसी जमीनी हकीकत को जाने या निष्पक्ष जांच किए, 12 मई को रिपोर्ट लगाकर मामला रफा-दफा करने की कोशिश की।
सवाल यह उठता है कि:
- क्या एक जांच अधिकारी बिना विवेचना के रिपोर्ट लगाने का अधिकार रखता है?
- क्या बस्ती पुलिस दबंगों के प्रभाव में आकर एक बेबस महिला के वीडियो साक्ष्यों को नजरअंदाज कर रही है?
- क्या ‘जीरो टॉलरेंस’ का दावा करने वाला प्रशासन ऐसे लापरवाह अधिकारियों पर कार्रवाई करेगा?
न्याय की गुहार
पीड़िता ने अब पुलिस अधीक्षक से इस पूरे मामले की पुनः विवेचना (Re-investigation) कराने की मांग की है। यदि समय रहते निष्पक्ष जांच नहीं हुई, तो रतास गांव की यह घटना पुलिसिया कार्यप्रणाली पर एक बड़ा धब्बा साबित होगी। अब देखना यह है कि कप्तान साहब अपने विभाग के इन ‘दागी’ तौर-तरीकों पर कैसे लगाम कसते हैं।
मुख्य बिंदु:
- पीड़िता: शशिप्रभा, ग्राम रतास (कप्तानगंज), बस्ती।
- आरोप: रास्ते पर अवैध कब्जा, मारपीट और जांच अधिकारी वीरेंद्र कुमार सरोज द्वारा पक्षपात।
- साक्ष्य: घटना का वीडियो उपलब्ध होने का दावा।








